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एक सत्य जो आपके सहयोग से भारत को पुनः इतिहास में खोयी जगह दिला सकता है.

Posted On: 23 May, 2015 Others,social issues,Hindi News में

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एक सत्य जो आपके सहयोग से भारत को पुनः इतिहास में खोयी जगह दिला सकता है.
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NOTE : किन्ही कारणों से अगर आप Tallenge.com पर वीडियो को नहीं देख सकें तो कृपया आसानी से मेरे You Tube Channel par Video को देखने के लिए प्रयोग करें URL:
https://www.youtube.com/watch?v=l5dpe5_GRKE

.वोट वा कमेंट देने हेतु वीडियो यूआरएल: http://www.tallenge.com/ravindra-k-kapoor.
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कुछ दिनों पूर्व मैंने शहतूत के पेड़ों और उनकी चिड़ियों के ऊपर एक पोएटिक लघुवीडियो फिल्म बनाई. इसके पात्र हैं शहतूत के पेड़ के फलों और उनके कीड़ों को खाने वाली सुन्दर चिड़ियाँ. पूरी कहानी एक सत्य घटना के कारण बन सकी. किन्ही कारणों से जब मेरे घर की दीवाल से लग कर बड़ा हुआ एक शहतूत का पेड़, जब मेरे परिवार के सदस्यों की दिवार के लिए एक बड़ा ख़तरा बन गया, तो उनके द्वारा उसे हटाना पड़ा और अचानक एक दिन मैंने बाहर से आकर देखा कि वो सुन्दर पेड़ जिस पर अनगिनत सुन्दर पछी आकर बैठते थे, वो पुराने घर के गिर जाने के खतरे के कारण एक दिन गायब हो गया. कई दिनों तक मैं उस पेड़ को किसी अपने जैसे को खो देने की पीड़ा की तरह दुखी हो झेलता रहा.
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पेड़ पर बैठे उन सुन्दर पछियों को देख मैं अक्सर उनकी फोटो और कभी कुछ वीडियो भी अपने कमरे से लेता रहता था. इस पेड़ के कारण न जाने कहाँ कहाँ से सुन्दर चिड़ियाँ आकर मेरे टैरेस की दीवाल पर बैठ वहाँ रख्खे पानी और कुछ दानों को खा कर अपने सुन्दर गीतों से मेरे कमरे के बाहर पूरा वातावरण संगीत पूर्ण रख मुझे भी कविताओं और गीतों कि रचना को प्रेरित करती रहती थीं.
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पर पेड़ के काट जाने के कारण बहुत सी सुन्दर अनजान चिड़ियों ने आना बंद या कम कर दिया. तब मेरे मन में ये विचार आया कि ज़रा देखाजाये कि चिड़ियों और शहतूत के पेड़ों में क्या कुछ ख़ास सम्बन्ध है? और इस पेड़ कि उपयोगिता कितनी है जिस पर इतनी सुन्दर और इतने तरह की चिड़ियाँ आती रहतीं हैं?
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इन रहस्यों को शायद मैं पूरी तरह से समझ नही पाता, अगर मुझे ये नहीं मालूम होता कि रेशम का उत्पादन सिल्क के जिन कीड़ों से होता है वो शहतूत के पेड़ पर ही फलते फूलते हैं और ये रंग बिरंगी चिड़ियाँ इसके फल और उन कीड़ों को खाकर जो आनंद प्राप्त करती हैं, वो उनकी प्रजाति को आगे बढ़ाने में बहुत सहायक होता है. तभी मुझे वो कहावत भी याद आयी जहां चिड़ियाँ चारों और अपना संगीत बिखेरतीं हैं और रहती हैं वो जगह खुसी और आनंद से भर जाती है जो अपने साथ लाती है प्रसन्नता, सम्पन्नता और असीम सुख की अनुभूती, जिसे हमारे वेदों और ग्रंथों में जगह जगह पर सुन्दर और विस्तृत कर लोगों को प्रेरित करने को दर्शाया गया है.
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तब जाकर मैनें इंटरनेट पर ढूंढ़ना और पढ़ना शुरू किया और मुझे मालूम हो सका कि चार हज़ार साल पहले ही सिंधु घाटी के लोगों को शहतूत के कीड़ों से रेशम (Silk) सिल्क को बनाने की कला का ज्ञान था. ये खोज की है अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के उन वैज्ञानिकों के सिंधु घाटी पर खोज करने वालों के द्वारा, जिनको वहां के अवशेषों में सिल्क (रेशम) के कपड़ों के अवशेष के पक्के पमाण मिले हैं और उसे उन्होंने इंटरनेट पर प्रकाशित भी किया है. मेरा मन ये पढ़ कर गर्व और सुखद अनुभूती से भर गया पर आगे मैंने जो पढ़ा वो इतिहास के वो सत्य थे और हैं, जो शायद भारत में कभी किसी ने जानने और समझने या पता लगाने या ढूंढने की कोशिश नहीं की, जिस के कारण भारत का ये गौरवशाली कार्य और इतिहास अतीत के कुछ उन मनीषियों की अतिविनम्रता के कारण भारत से निकल गया और उस घटना ने यहां की संम्पन्नता और सम्रद्धि को भी हमसे अनजाने में ही इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दूर बहुत दूर कर दिया.
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ये सब कुछ हुआ उन दिनों में, जब भारत की कीर्ती दुनिया में एक सोने की चिड़िया के रूप में जानी जाती थी. लगभग ढाई हज़ार से भी कुछ ज्यादा वर्ष पूर्व. ये कैसे हुआ और किस तरह हुआ इसकी एक परिकल्पना मैंने इस लघु फिल्म में दिखाने की कोशिश की है, कि कैसे एक ज्ञान जो हमारी संस्कृति और समृद्धी था हमसे चुरा और छीन लिया गया और जहां से वो घ्यान निकला था वही देश उसकी विरासत से ही नहीं गायब कर दिया गया वरन उसका जनक ही एक दूसरा देश बन गया. इसी बात को इस फिल्म में दिखलाया गया है ताकि हमारी आज कि पीढ़ी पीढ़ी ये महसूस तो कर सके की हम क्या थे और क्या हो गए और आज भी हम क्या बन सकते हैं अगर हम गर्व कर सकें, अपनी अभूतपूर्व विरासतों और संस्कृति पर.
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मेरी ये शार्ट फिल्म एक प्रयास है पेड़ों और विषेशरूप से शहतूत के पेड़ों को ही नहीं सभी तरह के पेड़ों और वृक्षों को, उन पर विचरने वाली चिड़ियों को बचाने का, जिससे कि बचे रह सकें हमारे खेत और खलिहान और वर्षा के बादल इन पेड़ों के कारण हमारे ऊपर अपना आशीर्वाद रख सकें.
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आपका प्रत्येक Vote हमारे देश इस गौरवपूर्ण बात को मुखर करने में मेरी इस लघु फिल्म को एक कदम आगे ले जाएगा और पूरा विश्व जान सकेगा कि विश्व में सिल्क के उत्पादन का पहला उत्पादक देश भारत था, न कि कोई और देश.
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पर अगर आपने केवल इस वीडियो को View किया तो इस वीडियो को नहीं के बराबर अंक मिल सकेंगे और एक अच्छे उद्देश्य से बनाई गयी मेरी या भारत की यह एंट्री अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पिछड़ जायेगी. केवल आप और बहुत से लोगों और सब का सहयोग और निष्पक्ष विमोचन और वोट इस काव्य रचना की कृति को सचमुच आगे ले जा सकती है.
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मुझे आशा है कि ऐसे कार्य में जागरण जंक्शन मंच का हर सदस्य वरन सभी भारतीय न केवल अपना वरन अपने दुसरे मित्रों का भी सहयोग इस वोट में प्रयोग कर जागरण जंक्शन के मंच के इस लेखक और लघु फिल्मकार को अपने देश की इस उपलब्धि को मुखरित करने में अपना बहुमूल्य सहयोग देने की इस प्रार्था पर मेरा साथ देगा, जिसके लिए मैं आप सभी का यथा सम्भव आभार बीच बीच में व्यक्त करता रहूंगा.
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फिल्म के वीडियो पर जाने के लिए कृपया निम्न URL को
कॉपी और पेस्ट करें या मेरे फेस बुक पेज पर जाकर Tallenge.com के वीडियो फिल्म कांटेस्ट में मेरी एंट्री ‘The Secret Story of Mulberry Birds’ me Vote हेतु क्लिक करें और वीडियो को watch कर अपना वोट दें.

आपका ही एक कानपूरवासी और मित्र
रवीन्द्र के कपूर
Ravindra K कपूर
वीडियो देखने हेतु URL:
http://www.tallenge.com/ravindra-k-kapoor
FACE BOOK URL:
https://www.facebook.com/ravindrak.kapoor

IMP. NOTE
शहतूत और कपास के पेड़ों पौधों के व्यापक विस्तार के कारण पहले हमारे देश में घी दूध की नदियां बहती थीं, जो बाद में केवल कपास के कारण सिमट कर आधी रह गयी और अंग्रेजों ने 1800 वीं शताब्दी में उसे अपने देश की सम्पन्नता बढ़ाने हेतु हमसे छीन कर अपने देश में विकसित कर लिया.
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ये केवल एक संजोग नहीं हो सकता कि भारत में बाहर से आने वालों का आना जाना भी लगभग ढाई हज़ार साल पहले शुरू हुआ और रॉ सिल्क से रेशम के कपडे बनाने की कला का एक दुसरे देश में जन्म भी ढाई हज़ार साल पहले और विडम्बना ये की जो घ्यान तीन हज़ार साल पहले तक सिंधु घाटी की सभ्यता में हमारी संम्पन्नता की धरोहर था वो अचानक भारत से गायब हो गया और हम आज तक ये नहीं समझ सके कि ये सारा घ्यान एक अन्य देश तक कैसे पहुँच गया जब कि हमारा देश उसका जनक था और वही घ्यान यहां से बिलकुल गायब हो गया?
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ये एक विस्तृत अनुसन्धान का विषय भी है और सतर्क रहने का भी.



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