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अंतिम अनुष्ठान – In Hindi & English

Posted On 3 Sep, 2017 में

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अंतिम अनुष्ठान – In Hindi & English also
.
जब जीवन उससे दूर चला गया
उसका शरीर एक निवास बन गया
स्थायी शांति का
नीरवता और मौन का
उन क्षणों ने उसके चेहरे पर खिला दिया
एक स्थायी मुस्कान को
जो विद्यमान थी उन छड़ों में
उसके प्यारे मनोहर चेहरे पर
जैसे कमल खिलता है और तालाबों के पानी पर निश्छल सा
और उसकी शाश्वत सुंदरता फैल जाती है
सभी को यह विश्वास दिलाने
कि वह ईश्वर के हाथों में है
जहां चिर शांति और दिव्य मौन मौजूद हैं
जहां आत्मा को अपनी अंतिम सांत्वना और आराम मिलता है 01
.
उसकी दयालु आंखें बंद थीं
लेकिन उसका चेहरा अभी भी जिवंत सा था
एक दिव्य महिमा के साथ
यह एक अजीब सी अभिव्यक्ति थी
जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा
कभी भी मेरे जीवन में
किसी भी जीवित या मृत आत्मा पर
जैसे कि वह संतुष्टि थी
कि उसका जीवन साथी
और उसके सभी प्रिय
उसके साथ रहे थे हमेशा
उसके शरीर, हृदय और आत्मा के करीब
और अभी भी वे उसके साथ थे
उसके दर्द और कष्ट के समय में
हर समय, उसके अंतिम लम्हों तक. 02
.
उसके हाथों और पैर की मांसपेशियों की कठोरता
जो अक्सर उसे असहनीय दर्द देने के लिए आते थे
हमेशा के लिए गायब हो गए थे
सूर्य की अंतिम दिव्य किरणों की तरह
जो क्षितिज से परे दूर चली जातीं हैं
सूर्य की मादक सुनहरी किरणों को छोड़कर
इसी तरह वह भी अब पूरी तरह मुक्त हो गई थी
भारी साँसों के बोझ से
बोझ रहित और मुक्त
सभी बंधनों और दर्दों से
उसके शरीर में अब सब कुछ हल्का और मुक्त था
उसके हाँथ और शरीर ऐसे नरम थे
मानों वो मुलायम और नरम थे – लाल मखमली बिलबोटी की तरह
मुझे ऐसा लग रहा था
जैसे कि वो गहरी नींद में थी
और उन क्षणों में मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था
वह जल्द ही जाग जायेगी
अपनी सदाबहार अच्छी सुप्रभात
की मीठी मुस्कुराहट के साथ
जो चमकती थी हर सुबह
उसके प्यारे दयालु चेहरे पर.03
.
गीता की अमर वो लाइनें
मेरे मन में प्रवाहित होना शुरू हो गयीं
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः* 04
.
“आत्मा कभी टुकड़ों में काटी नहीं जा सकती
किसी भी हथियार से,
और नहीं इसे आग से जलाया जा सकता है
न ही पानी इसे सोख सकता है,
और नहीं हवा इसे सूखा सकती है ”
इसने केवल अपने थके हुए शरीर को बदल दिया है
ताकि वह पुनर्जन्म ले सके
सूर्य की नई किरणों की तरह
जो दिन के अंत में गायब हो जाती हैं
लेकिन हर सुबह फिर से आ जाती हैं
एक जीवनदायी सब कुछ खिला देने के
प्रभाव के साथ
जिससे कि हर पौधे और पेड़
हर फूल और कलियों
भगवान की ताज़ा ऊर्जा महसूस कर खिल सकें। 05
.
मुझे पता था कि उसकी मधुर मुस्कराहट भरा चेहरा
और उसका विनम्र शरीर
अब कमजोर और शक्तिरहित हो चुका था
आधुनिक दवाइयों के अत्याचारों के कारण
और सैकड़ों दर्दनाक परीक्षण
जिसे उसने पिछले कुछ हफ्तों में सामना किया था
वो अपने खराब प्रभावों को खो चुके थे
जो जीवन के आखिरी क्षणों में उसे परेशान कर रहे थे
और अब वह सभी पीड़ा और दुख से मुक्त थी
सभी बंधनों और परवाह और प्रतिज्ञाओं से
क्योंकि वह अब परमेश्वर के दिव्य हाथों में थी. 06
.
इसके बाद उसके शरीर की अंतिम यात्रा थी
गंगा नदी के किनारे
उसकी अंतिम और आखरी अलविदा के लिए
वो क्षण बहुत भारी थे
जब हम पूरी रात इंतजार कर रहे थे
उसके परिवार के आने के लिए
उसके बेटे के लिए
पूर्ण नीरवता और रात्रि के अंधेरे के इस समय में
जब वह एक शीतल बॉक्स में आराम कर रही थी
हम रामचरितमानस से उनका पसंदीदा अध्याय पढ़ रहे थे
“सुंदरकांड ”
जब हमने इसे सुबह सबेरे में पूरा किया
सूर्य की सुनहरी किरणें फ़ैल रही थीं
थोड़े बादल छाए हुए थे
अपनी अंतिम सुनहरी किरणों को
उसके निशब्द, शांत शरीर और चेहरे पर
मेरी प्यारी पत्नी शशी पर
फैलाने के लिए
जो अभी भी लगभग वैसा ही था
जैसे कि वह आराम से सो रही हो
हालांकि मैं समझ सकता था कि
उसके शरीर में आतंरिक परिवर्तन
लगातार हो रहे थे
हमें यह स्मरण दिलाने कि
हम उसे इस तरह नहीं रख सकते
सदैव। 07
.
……. शेष अगले भाग में कुछ समय पश्चात
Ravindra K Kapoor
30th Aug. 2017
.
*अर्थात – इस आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सूखा नहीं सकता ।
.
NOTE: मेरी ये कविता हिंदी की कुछ गिनी चुनी कविताओं की श्रेणी में आती है जो जीवन के बाद शुरू होती है. मैं नहीं जानता की हिंदी साहित्य में ऐसी कोई रचना है या नहीं? हो सकता है मेरी इस प्रयोगात्मक श्रद्धांजलि को साहित्यकार पसंद करें या ना करें पर इस कविता के मूल अंग्रेजी को पढ़ने के बाद विश्व के कई लोगों ने इसे एक दुःख के साथ ढारस बढ़ाने वाली कविता के रूप में सराहा और पसंद किया है. मेरी प्रिय पत्नी की याद में समर्पित इस कविता को वो भाग अभी शेष है जहां शरीर अग्नि में समर्पित हो राख और अस्थियों में रह जाता है. पर उस भाग के बिना भी ये कविता “आखिरी अनुष्ठान” एक पूर्ण कविता है. जिसे मैं हिंदी के साथ इसके मूल अंग्रेजी में भी यहां दुबारा रख रहा हूँ जिसे कि पोएट्री सूप के अलावा मैंने फेसबुक पर ही Breath of fresh air में भी रख्खा है. …Ravindra K Kapoor
30th Aug. 2017

The last rituals
.
When life flew away from her
Her body became an abode
Of lasting peace
And of calm and quietness
Those moments had made her face blooming
With a permanent smile
Which was resting
On her sweet pleasing face
Like the Lotus blooms and rest on ponds water
And spread its eternal beauty
To make everyone believe
That she is in the hands of God
Where peace and divine silence exists
Where the soul gets its ultimate solace and rest. 01
.
Her kind loving eyes were closed
But her face was still alive
With a divine glory
It was the strangest expression
I have never witnessed
Ever in my life
On any living or departed soul
As she had the satisfaction
That her life partner
And all her dear ones
Were always there with her
Very close to her body, heart and soul
And still they were with her
In the hours of her pains and sufferings
All the time till her very last. 02
.
The stiffness of her hands and leg muscles
Which often used to come to give her unbearable pains
Had gone for ever
Like the last departed rays of Sun
Which goes beyond the horizons
Leaving her intoxicating golden rays
Similarly she was fully free now
From the burden of heavy breaths
Light and free
From all bondages and pains
Everything in her became light and free
Making her hands and body
Soft and smooth like the red velvet Bilboti
It seemed to me as if
She was in deep sound sleep
In those moments
And she would wake up soon
With her evergreen sweet smile
And good morning
Which used to shine every morning
On her kind and loving face. 03
.
The immortal lines of Geeta
Began to overflow in my mind
“nainam chindanti shastrani
nainam dahati pavakah
na chainam kledayanty apo
na sosayati marutah”. 04
.
“The soul can never be cut to pieces
By any weapon, nor burned by fire,
Nor moistened by water,
Nor withered by the wind”
Only it has changed its tired and exhausted body
So that it may take a rebirth
Like the new rays of Sun
Which get vanished in end of the day
But comes every morning
With a life giving and blooming effects
In which every plant and trees
Every flower and buds
Feels the refreshing energy of God. 05
.
I was aware that her sweet smiling face
And her humble body
Which became weak and powerless
Because of the tortures of modern medicines
And hundreds of painful tests
Which she faced in the last few weeks
Had lost their ill effects
Which was paining her in the last moments of life
And now she was free from all pains and miseries
From all bondages and cares and pledges
As she was in the divine hands of God. 06
.
The next was her body’s final journey
Towards the river bank of Ganga
For its last and final good bye
The moments were heavy
When we waited for the whole night
For her son with his family to arrive
During this time of complete silence & darkness
When she was resting in a cool box
We were reciting her favorite chapter from Ramcharitmanas
“The Sundar Kanda”
When we completed it in the early morning
The golden rays of Sun were
Piercing the slightly clouded sky
To spread its last rays
On the cool and calm body and face
Of my dear wife Shashi
Which was still in the same stage
As if she is in rest and sleeping
Although I knew that
Changes inside her body were still
Taking place
Reminding us that
We cannot keep her like this
Forever. 07…………to be concluded after some time
Note even without the IInd Part this poem is complete.
Note: The Poem is complete even without the remaining part.



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