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Ravindra K Kapoor


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रामचरितमानस पर एक नई पहल

Posted On: 10 Dec, 2015  
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Others social issues कविता में

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आईये गोरैया और चिड़ियों को बचाएं

Posted On: 11 May, 2015  
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Junction Forum Others lifestyle में

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क्या होगा जब खेत खलिहान न होंगे -1

Posted On: 17 Feb, 2015  
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Others social issues कविता में

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बारिस का गीत

Posted On: 29 Oct, 2014  
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Others Others कविता में

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एक इंतज़ार का प्रेम गीत

Posted On: 3 Aug, 2014  
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नई सुबह का गीत

Posted On: 12 Jun, 2014  
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एक समाचार जो समाचार नहीं बन सका

Posted On: 9 Sep, 2013  
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Others social issues कविता में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बहुत सुन्दर और प्रभाबकारी रचना बधाई स्वीकारें अँधा धुंदी बिकास के नाम पर जंगलों और पर्याबरण को जो नुकसान पहुँचाया जा रहा है इसकी कीमत भी आने बाली पीढ़ियों को चुकानी होगी . ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल) कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं ना ही रोशनी आये ,ना खुशबु ही बिखर पाये हालत देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों भूले से भी मेहमाँ को नहीं घर में टिकाते हैं अब सन्नाटे के घेरे में ,जरुरत भर ही आबाजें घर में ,दिल की बात दिल में ही यारों अब दबातें हैं मदन मोहन सक्सेना

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: achyutamkeshvam achyutamkeshvam

के द्वारा: Rajesh Kumar Srivastav Rajesh Kumar Srivastav

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के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय वासुदेवजी, आपने उचित ही कहा है. रामायण को मैं भी वास्तव में केवल भारतीय संस्कृति और जनमानस से जुडी हुई ही रचना नहीं मानता, वरन उसे भारतीयों के ह्रदय और शायद उससे भी अधिक उनकी आत्मा से जुड़ा एक ऐसा सम्पर्क सूत्र मानता हूँ जिसने हज़ारों सालों से हमारी संस्कृति और प्राचीन सभ्यता को संजों कर रक्खा है. इस चौपाई को केवल एक उधाहरण के रूप मैंने यहाँ इसलिए रखना उचित समझा जिससे कि श्री राम और रामकथा के विद्वान भक्तों और रामायण को सुन्दर पढ़ने वालों से मैं न केवल कुछ सम्पर्क में आ सकूं वरन समय समय पर गूढ़ दोहों या छंदों पर उनसे परामर्श भी कर सकूं, जिससे कि इस प्रयास को मूर्तरूप देने में, यथा सम्भव आप सब के सम्पर्क से त्रुटियों को दूर किया जा सके और इस पुनीत ग्रन्थ कि भावना को सुन्दरतम रूप में रख्खा जा सके. वरना चौपाई तो अंतिम चरण का प्रयास होगा जिसमे अभी बहूत समय लग सकता है त्रिपाठीजी. . सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात ये है कि मूल रामायण के दोहों या छंदों आदि को भी साथ साथ यथावत रखने का भी पूरा प्रयास रहेगा, बिना एक मात्रा या उसके उच्चारण में कहीं कोई भी परिवर्तन के. हाँ अगर आप अपना कुछ बहुमूल्य समय भी कभी कभी दे सकें, तो त्रिपाठीजी में आपका अति आभारी रहूँगा. आपका और कुछ अन्य रामायण के प्रेमियों को ले कर हम लोग माह में एक बार थोडा समय कुछ विशिष्ट बिन्दुओं पर चर्चा हतु रख सकेंगे और इस प्रकार जागरण के इस मंच के मित्रों के बीच एक सम्पर्क भी बन सकेगा. ये इस प्रयास को कुछ थोडा निखार सकेगा. जो लोग भी इस प्रयास में निरंतर सहयोग देंगे, उनके नाम के उल्लेख बिना न ये रचना पूर्ण होगी और नहीं वो ऑडियो विडियो जिसके लिए मुझे अभी बहूत कुछ प्रबन्ध करना है. शायद मेरे हनुमानजी या प्रभुश्रीराम ही आगे का मार्ग दिखायेंगे और आगे के साधनों का प्रबन्ध भी. . आपके सुन्दर विचारों और सुभकामनाओं के लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ. रवीन्द्र .

के द्वारा: Ravindra K Kapoor Ravindra K Kapoor

निशाजी सच पूछें तो मुझे अंग्रेजी की रचना को जागरण पर लिखने का दुःख है पर आजकल पोएट्री सूप पर मैं अपने पिता की १९६५-७० के समय की एक रचना को जो की मूल रूप से हिन्दी में लिखी गयी थी के मेरे द्वारा किये गए अनुवाद " Incineration of Love God Madan (Cupid)23 ..(मेरे पिता के जीवन काल में ही १९77 के लगभग ) को पुनः ठीक कर इस अनमोल रचना जो की "मदन दहन" के नाम से उन्होंने लिखी थी, को उसके विलुप्त होने के पहले विश्व के सामने लाने का प्रयत्न कर रहा हूँ, इसी कारण आप सब की सुन्दर रचनाओं से कुछ दिनों के लिए विमुख हूँ. पर आपके स्नेह के शब्द और सुन्दर रचनाओं को पढने को इच्छा हमेशा रहती है. शेष आपकी रचना पर ..स्नेह सुभकामनाओं के साथ ...रवीन्द्र

के द्वारा: Ravindra K Kapoor Ravindra K Kapoor

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

प्रिय मित्र, पत्र के लिए धन्यवाद. आपके उदगार समाज में व्याप्त उस वातावरण की आहट देते हैं जो हमारे जनमानस में से केवल कुछ थोड़े से लोगों को जगा सकी है. मैं आपके द्वारा खीचे गए चित्र से पूरी तरह से सहमत हूँ. यही तो कामना की है मैंने अपनी इस कविता में की मेरे देश के लोग जागें महसूस करें उस भयावह पीड़ा को जो इस देश के नागरिकों k को रोज हरपल आज सहनी पद रही है, पर केवल आप के जागने से कुछ न होगा मित्र और जब तक जनमानस नहीं जागेगा और कुछ करेगा, तबतक हम केवल बात ही करते रहेंगे. जागना केवल नींद से जागना ही नहीं होता मित्र, बल्कि ये वो अहसास होता है जो समाज में एक परिवर्तन ला सकता है. आप भी परिवर्तन की बात कर रहे हैं और मैं भी उसी की बात कह रहा हूँ. मेरे और आपके कहने में फर्क केवल इतना है की आप इस देश के समाज में फैली कुरीतियों के साथ दिन दूने रात चोगने बढ़ते जा रहे अपराधों और भयावह क़ानून व्यवस्था को केवल समाज के सामने रख कर अपने कर्त्तव्य की इति मान रहे हैं और मेरा प्रयास इतना और है की जब तक एक जनक्रांति पैदा न हो कम से कम हम कुछ करने की कोशिश करें. मैंने अपनी शब्दों में टेम्पो की एक ज्वलंत समस्या के विषय में कहा था पर मित्र वो समस्या वह नहीं जो आप ने लिखा है. मेरी समस्या समाज में घटित हो रही उस दशा को दर्शाती है जो ऊपर से समुद्र में तैरते हिमखंड की तरह है जो तमाम साडी कुरीतियों, अपराधीकरण और क़ानून को जेब में रख कर चलने वाले इन टेम्पो चालकों ने खड़ी की है. हर मोड़ पर सवारियों को यातायात के नियमों को जेब में रख कर केवल कानपूर में बैखोफ घुमने वाले इन सत्तर हज़ार टेम्पो चालकों के कानपूर ही नहीं पुरे प्रदेश में और पुरे प्रदेश में लाखों की संख्या में ये गंदगी फैला रहे और ऐसा ही माहौल बना रहे इन समाज के ऊपर कलंक बनते जा रहे क़ानून की धिजिज्याँ उड़ाते ये अब हमारे नवयुवकों के मूक प्रेरणा बनते जा रहे हैं. मोटर साइकिल के आज के नवजवान अब सड़क के उलटी और बैखौफ चलते हैं. ये सब आने वाले उस समाज की सुगबुगाहट है जो हमारा जो कुछ भी अच्छा है उसे नस्ट कर देगा. इसीलिए ये मेरा एक छोटा सा सुझाव है आप जैसे सवेदनशील लेखकों से की समय की जरूरत के साथ केवल समस्या ही नहीं उनके समाधान के विषय में सोचना और कुछ करने का प्रयत्न भी शुरू करें. एक एक बूँद से ही तालाब भर जाता है और सागर भी एक एक बूँद से ही बना है मित्र. शुभकामनाओं के साथ ......रवीन्द्र के कपूर

के द्वारा: ravindrakkapoor ravindrakkapoor

रवीन्द्रजी चारो तरफ घूसखोरी, भ्रस्टाचार, चोरी, डकैती, बलात्कार, राहजनी, खून हो रहे अहि और अपराधी सीना चौड़ा कर घूम रहे है | विकास कहीं नहीं दिखता है, infrastructure में कोई सुधार नहीं है, आबादी दिन दूनी रात चौगुनी बढती जा रही है, सारे बड़े कम्पनी बंद हो चुकी है बेरोजगारों को कोई रोज़गार नहीं है | ऐसी दशा को आप क्या कहेंगे ? टेम्पो अरज़कता की बात कर रहे है, निदान ज़रूर है, उस टेम्पो में जनता बैठे ही नहीं जिसमे पहले से 8 सवारी बैठी हो , जहाँ मन चाहे वहां न रोका जाए निर्धारित स्टैंड पैर ही रुके , टेम्पोवाले टेम्पो को कानपुर की शान बनाए जैसे थाईलैंड में टुकटुक है, टेम्पोवाले एक लाइन में खड़े होकर अपने पारी का इंतज़ार करे, सवारी को पकड़ कर खीचंतानी न करे | ८ से ज्यादा सवारी बैठने से इनकार करें भले ही किराया थोडा बढ़ा दें | अपने बीच ही यह निर्धारित करें की इस माह कौन किस रूट पर चलेगा , जैसे रामदेवी से रावतपुर, रावतपुर से मंधना, मंधना से चौबेपुर, पुरे शहर को इस प्रकार के सेक्टरों में बाँट लिया जाए | यातायात के नीअमो का पालन करें और जो तोड़े उसे टोकें | लेकिन बिल्ली के गले में घंटा कौन बांधे जो कोशिश करेगा बहुबल से उसका सर्वनाश कर दिया जाएगा, अगर आप की पहुँच ऊपर तक है तो पुलिस सुनेगी वर्ना आपकी ज़िन्दगी बेकार | दिव्या के केस को लीजिए क्या हुआ, आरोपी को कोई सजा हुई क्या और होगी भी नहीं क्योंकि उस बछि के माँ बाप गरीब है और कोई अगर सहायता के लिए आगे बढेगा उसे भी पुलिस फसा देगी, ऐसे में कोई नेता, आला दर्जे का आफिसर, हाई या सुप्रीम कोर्ट का जज कुछ कर सकता है, मेरे जैसा कोई अदना नहीं | एक मुह पर acid फेंकने की घटना हुई थी आरोपी तो शादी कर के मस्त है, क्या हुआ ? ऐसे हालात को आप सदा हुआ और बदबूदार नहीं कहेंगे ? मई भी अगर राष्ट्रपति होता तो बड़ी बड़ी बात कर सकता था की हिन्दुस्तान रिमोट सेंसिंग में अव्वल है फलाना है ढमाका है | सब positive सोचने की बात करते है जब चारो तरफ नेगतीवे आबोहवा हो तो आप भी demotivate होकर negative ही सोचने में मजबूर हो जाएंगे, भई एक आम आदमी के साथ ऐसा ही होता है | आप किसी भी सरकारी आफिस में जाकर बिना घूस देकर काम करवाकर दिखा दीजिए, एक आम जनता चक्कर लगाते - लगाते मर जाएगा लेकिन काम नहीं होगा | कल की ही बात लीजिए मेरे एक मित्र ने अपना एक छोटा सा फैक्ट्री लगाया है, sales टैक्स के आफिस में उसको १७,००० रूपए खरचने पड़े और कल assistant commissioner साहब सर्वे करने आए थे २२०० रूपए झटक गए | अगर वह यह सब नहीं करता तो उसको अपनी रोज़ी कमानी मुस्किल हो जाती | तो आप ऐसे व्यवस्था को बदबूदार नहीं कहेंगे ? मै यातायात के नियमो का पालन करता हूँ लेकिन जब दूसरो को टोकता हूँ तो गाली सुनने को मिलती है | प्रिय रवीन्द्रजी अकेला चना भाद नहीं फोड़ सकता है, इसीलिए कटाक्ष करता हूँ की शायद कोई तो मेरे साथ एकमत होगा और एक जागरूकता पैदा होगी | आप के क्या विचार है ? धन्यवाद | वन्दे मातरम

के द्वारा:




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